पानी तेरी वाणी

सुबह ओश बनकर, जो फूल पत्तो पे गिरा होता है,
वो  एक बीज से भी फूल बना देता है।

जो बचपन में इंसान की आँख से छलकता है,
और जवानी में, सीने से जो उसके टपकता है।

उसी से बहार आती है , वही पतझड़ बुलाता है ,
नाम तो बहुत है उसके , पर इंसान उसे पानी बुलाता है।

सूखे में हम पानी की एक बूँद को तरसते है ,
पर जब बरसात आती है तो हम सूखे की राह तकते है।

यही देता हमें जीवन, यही वापिस निगलता है ,
फिर भी हमारे दिल में इसका ख्याल तक न आता है।

अगर आवाज होती तो में बताता तुझे मनुष्य ,
की जिसपे सभ्यता बानी है , तू उसे चलना सिखाता है।

व्यव्हार सीखने गया था, संस्कार छोड़ आया है ,
में उससे क्या उम्मीद करूँ कुछ, जिसने खुद छोड़ दी अपनी छाया है।

तू फिकर कर अपनी , में अपनी फिकर खुद कर लूंगा ,
अगर थक गया करते करते , तो एक आँह भर लूंगा।

फिर तू ये समझ लेना, की और अब में सह नही सकता ,
मुझमे भी एक जीवन है, काश तू भी ये समझ सकता।

अगर बिगड़ गया में तो, में सब कुछ डूबो दूँगा ,
तुम ढूँढ़ते रह जाओगे जीवन, पैर में उसका निशान भी नही रहने दूंगा।

– निखिल रावत

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